ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैंजनियां ॥
किलकि किलकि उठत धाय गिरत भूमि लटपटाय ।
धाय मात गोद लेत दशरथ की रनियां ॥
अंचल रज अंग झारि विविध भांति सो दुलारि ।
तन मन धन वारि वारि कहत मृदु बचनियां ॥
विद्रुम से अरुण अधर बोलत मुख मधुर मधुर ।
सुभग नासिका में चारु लटकत लटकनियां ॥
तुलसीदास अति आनंद देख के मुखारविंद ।
रघुवर छबि के समान रघुवर छबि बनियां ॥
April 12, 2014
February 23, 2013
अग्निपथ
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| हरिवंश राय बच्चन |
वृक्ष हों भले खड़े
हों घने, हों बड़े
एक पत्र छाँह भी
मांग मत! मांग मत! मांग मत!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!
तू न थकेगा कभी
तू न थमेगा कभी
तू न मुड़ेगा कभी
कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!
यह महान दृश्य है
चल रहा मनुष्य है
अश्रु-स्वेद-रक्त से
लथ-पथ! लथ-पथ! लथ-पथ!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!
October 19, 2012
कलम या कि तलवार
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| रामधारी सिंह "दिनकर " बेगुसराय, बिहार २३ सितम्बर, १९०८ - २४ अप्रैल १९७४, |
मन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति विजय अपार
बंद कक्ष में बैठ लिखोगे ऊँचे मीठे गान
या तलवार पकड़ जीतोगे बाहर जा मैदान
कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली
मन ही नहीं विचारों में भी आग लगाने वाली
पैदा करती कलम विचारों के जलते अंगारे
और प्रज्वलित प्राण देश क्या कभी मरेगा मारे
October 06, 2012
जीवन नही मरा करता है
![]() |
जन्म: ४ जनवरी, १९२४, इटावा, उत्तर प्रदेश
| ||||
| सपना क्या है, नयन सेज पर सोया हुआ आंख का पानी और टूटना है उसका ज्यों जागे कच्ची नींद जवानी | ||||
| गीली उमर बनाने वालो डूबे बिना नहाने वालो कुछ पानी के बह जाने से सावन नही मरा करता है | ||||
| माला बिखर गई तो क्या खुद ही हल हो गई समस्या आँसू ग़र नीलाम हुए तो समझो पूरी हुई तपस्या | ||||
| रूठे दिवस मनाने वालो फटी कमीज़ सिलाने वालो कुछ दीपों के बुझ जाने से आंगन नही मरा करता है | ||||
| खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर के़वल जिल्द बदलती पोथी जैसे रात उतार चांदनी पहने सुबह धूप की धोती | ||||
| वस्त्र बदलकर आने वालो चाल बदलकर जाने वालो चंद खिलौनों के खोने से बचपन नही मरा करता है | ||||
| लाखों बार गगरियां फूटीं शि़क़न न आई पर पनघट पर लाखों बार कश्तियां डूबीं चहल पहल वोही है तट पर | ||||
| तम की उम्र बढाने वालो लौ की आयु घटाने वालो लाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नही मरा करता है | ||||
| लूट लिया माली ने उपवन लुटी न लेकिन गंध फूल की तूफानों तक ने छेड़ा पर खिड़की बंद न हुई धूल की | ||||
| नफरत गले लगाने वालो सब पर धूल उडाने वालो कुछ मुखडों की नाराज़ी से दर्पन नही मरा करता है |
August 11, 2012
मैया मोरी, मैं नही माखन खायो
मैया मोरी, मैं नही माखन खायोभोर भयो गैयन के पाछे, मधुवन मोहि पठायो ।
चार पहर वंशीवट भटक्यो, सांझ परे घर आयो ॥
॥ मैया मोरी .......... १ ॥
मैं बालक बहियन को छोटो, छींको किहि विधि पायो .
ग्वाल-बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो ..
॥ मैया मोरी .......... २ ॥
तू जननी मन की अति भोली, इनके कहे पतियायो .
यह ले अपनी लकुटि कम्बलिया, तुने बहुतहि नाच नचायो .
जिय तेते कछु भेद उपजिहै , जानि परायो जायो ..
"सूरदास" तब हँसी यशोदा, लै उर-कंठ लगायो ..
॥ मैया मोरी ..........
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